जब पहली बार किसी स्त्री ने......
आज सोचती हूँ— जब पहली बार सावित्रीबाई ने घर की देहरी लाँघी होगी, जब हाथों में पुस्तक लेकर अज्ञानता से जंग ठानी होगी, तब कितनी आँखों में क्रोध जला होगा, कितनों ने धर्म का भय पाला होगा। जब पहली बार किसी स्त्री ने घूँघट का पर्दा हटाया होगा, जब खुली हवा में साँस लेकर अपने अस्तित्व को अपनाया होगा, तब समाज ने उसे निर्लज्ज कहा होगा, मर्यादा के नाम पर उसका साहस कुचला होगा। जब पहली बार कोई बेटी मंचों पर जाकर बोली होगी, जब सदियों की चुप्पी तोड़ अन्यायों पर डोली होगी, तब कितने सिंहासन काँपे होंगे, कितने अहंकार थर्राए होंगे। किसी ने कहा होगा— “स्त्री की आवाज़ शोभा नहीं देती”, किसी ने कहा होगा— “बहुत पढ़ाई लड़कियों को बिगाड़ देती।" आज सोचती हूँ— जब पहली बार किसी विधवा ने सफेद आँचल उतारा होगा, जब सूनी माँग में फिर जीवन का रंग सँवारा होगा, तब इस समाज ने उसे पापिन कहा होगा, उसके हर सपने को अधर्म बताया होगा। और जब पहली बार किसी लड़की ने जाति की दीवारें तोड़ अंतरजातीय विवाह किया होगा, तब कितनों ने रिश्ते तोड़े होंगे, कितनों ने उसे कुलकलंकिनी कहा होगा। क्योंकि यह समाज प्रेम से अधिक जाति को पूजता आय...

Hey friends, if u like my poetry plz like and comment
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ReplyDeleteyour writing skills good
ReplyDeleteThank you so much
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