"छत से टपकता पानी " A poetry depicts the common man & reality of the system of our country(By Ankita Tantuway)
गुजर रही है रात एक , कोने में हाथ सेक कर।
व्यथित है सरजू बेचारा ,टपकता पानी देख कर।
बच्चे सहम कर बैठे है , बिस्तर को बचा रहे
और थक गयी पत्नी अकेली, बहता पानी फेक कर ।।
लकड़ी खपड़े की छत और मिट्टी की दीवार है
गीला पड़ा है फर्श और पानी की तेज ब्यौछार है ।
इसी बीच भीगते खास्ते , मुनिया वही गिर पड़ी
सर छुआ तो पता चला मुनिया को बुखार हैं।।
उभरा ही था डर से कि मुनिया फिर बोल गयी।
बाढ़ आयेगी क्या फिरसे बापू? डरके दरवाजे खोल गयी ।
बाढ़ का प्रकोप कैसे छाया था जब गाँव में।
उजड़ गयी थी गृहस्थी पूरी ,भटके थे दूजे छाँव में।
वैसे तो मकान बनवाने की बड़ी सरकारी योजना है ।
जमीनी स्तर पे कितना पालन, क्या किसी को चेतना है?
मना किया था रिश्वत देने ,सरजू ने उन भृष्टाचारों को ।
मिला न लाभ आज तक इसका, सरजू जैसे हज़ारों को ।
ठान लिया वो भी की अब ,पक्का मकान बनाना है ।
सरकार के इंतेजार में अब ,ना ये साल गवाना है ।
मगर पैसे कहाँ से लायेगा, न नौकरी, न व्यापार है।
निराश है सोचके कि वो पढ़ा- लिखा बेरोजगार है ।
गमगीन था खयालों में तब ही थोड़ी पानी रुका।
चल दिया दवाई लेने, गमछे से अपना सर छुपा ।
कुछ कदम बढ़ा ही था , एक साथी कुछ कह गया ।
"सरजू बाबू कहाँ चले? सड़क पार का पुल ढह गया "
लौटा उदास मजबूर था , लगा उसे आघात था ।
पत्नी दवाई पूछ रही, मगर वो खाली हाथ था।
कुछ ही पल में तेजी से ,ज़िंदगी उसकी उजड़ रही।
हर दिन बेटी की तबियत और ज्यादा बिगड़ रही ।
जैसे- तैसे मुनिया को लेकर ,महीने भर मे शहर गए ।
डॉक्टर बोले "देर कर दी " सुनते ही सब बिखर गए ।
आखिरी सांस ली उसने जब,सरजू का दिल भर आया ।
मजबूर पिता और क्या करता ,दुनिया से विदा कर आया ।
टूटा पुल, ना कोई सुविधा , दवाई का ना कोई साधन था ।
आवेदन पे आवेदन लेकर, खामोश पूरा प्रशासन था ।
ये तो बस एक ही किस्सा, जाने कितनी अभी कहानी है ।
देश की अभी कितनी मुनिया , देती ऐसी कुरबानी है ।
इसी बीच एक नेता ने, दे दिया धर्म पे एक बयान ।
हो गया विवादित इतना कि खींच लिया सभी का ध्यान।
क्या बेरोजगारी, क्या स्वास्थ समस्या न लिया किसी ने संज्ञान।
अखबार, टी वी , सब एक ही खबर का कर रहे खूब बखान ।
बुनियादी स्तर पर देखो तो, गरीबों का क्या हाल है ।
कैसे कराये इलाज ,जब मीलों दूर अस्पताल है।
कई पुल टूटे, कच्ची सड़के भी जाम हो जाती है।
इसी तरह कई मुनिया की जान आम हो जाती है ।
क्यों कागज पर रहती स्कीमें, जमीन पे कोई असर नहीं ?
बिना रिश्वत के काम न होता,क्या इसकी ऊपर खबर नहीं ?
क्यों सरजू जैसे स्नातक पढ़े को, जकड़े है आज बेरोजगारी
इलाज की कमी से मरते लोगों की ,कौन लेगा अब जिम्मेदारी?
धर्म पे घण्टों बैठक चलती, इसपे क्यों कोई बात नहीं ?
बढ़ते अपराध, और लापरवाही पे क्यो कोई सवालात नहीं?
आवेदन लिखे, धरने दे, जनता क्या पैतरे आजमाए ?
कितनी अंकिता कविता लिखे कि इसका निवारण हो जाए
और कितनी अंकिता कविता लिखे कि इसका निवारण हो जाए....
~ Ankita Tantuway
👏👏👏
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