1857 से 1947 तक का सफर ||कविता || By Ankita Tantuway
अठारह सौ संतावन् में, भड़की पहली चिंगारी थी |
मंगल पांडे के शौर्य से जब, चमकी ये धरती सारी थी ||
अंधेरे में ये दीपक सा, किस्सा बनके ये उभर गया |
हर क्षेत्र से एक वीर जवान, अंग्रेजों से जाके अभर गया ||
कानपुर से नाना साहेब, लखनऊ से बेगम हज़रत अड़ी रही|
कुंवर सिंह हो या तात्या टोपे, झांसी की रानी भी खड़ी रही ||
गदर की ज्वाला शांत हुई, पर मन में अंगार रहा |
हर बस्ती, हर गांव में बेहद, आजादी को लेकर खुमार रहा ||
लाल बाल पाल की ललकार से, अंग्रेजी हुकूमत काँप गयी |
आजादी से भारत दूर नहीं, अब वो ये भी भांप गयी ||
1905 में स्वदेशी आंदोलन का ऐसा बिगुल बजा डाला |
विदेशी वस्त्र जला दिया, घर घर चरखा सजा डाला ||
फिर आये महात्मा गाँधी , सत्य अहिंसा की मशाल जली |
चंपारण, खेड़ा, नमक सत्याग्रह, आंदोलन से फिर आस जगी ||
नेहरू, पटेल या सुभाष भगत हो, गूंजते थे सबके स्वर एक |
"इंकलाब जिंदाबाद" कहते कहते दिखा गये सब इरादे नेक ||
जलियावाला बाग में बही, मासूमों की धारा लाल |
जनरल डायर की गोलियों ने, भड़का दी आजादी की ज्वाल ||
रविंद्र नाथ ने लौटा दिया था, "नाईटहुड "का दिया वो मान |
विश्व ने देखा अंग्रेजों का भारत से होते सच्चा अपमान ||
1920 में असहयोग आंदोलन, गाँधी जी की आई पुकार |
विदेशी कपड़े छोड़े गये, स्कूल -कोर्ट ने किया दरबार ||
फिर दस्तक दी साइमन ने तो, भारत ने लगा दी फिर फटकार |
" साइमन गो बैक " कह चिल्लाये, सहम गयी अंग्रेजी सरकार ||
"करों या मरों " का नारा गूंजा, 1942 में हुआ संग्राम |
भारत माता चीख गयीं, "अब तो देदो मुझे विश्राम " ||
जन -जन बन गया सैनिक , बूढ़ा- बच्चा, नर -नारी धन |
भारत छोड़ो आंदोलन में , सबने लिया कुछ ऐसा प्रण ||
अंग्रेजी सत्ता डगमगा गयी, जाग उठा जब हिंदुस्तान |
हर गली में गूंज रहा था वंदे मातरम् और राष्ट्रीय गान ||
अंततः आई सुहानी भोर , जब लाल किला मुस्काया था |
पंद्रह अगस्त को तिरंगे ने आजादी का गीत सुनाया था ||
संतावन् से सैतालिस का, था वीरों का संघर्ष महान |
माँ भारती के आँचल में , हमने फिर पाया हिंदुस्तान ||...
हमने फिर पाया हिंदुस्तान......
-अंकिता तंतुवाय
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